Rajasthan Government to develop Pearl Farming in State

Rajasthan Government is exploring ways to develop pearl farming in the state.  The government has made all preparations for the pilot project which will be launched in Jaipur and the agriculture department has decided to send a team of officials to Odisha for a week-long training programme on pearl farming for the purpose.

 

What is Pearl ?

A pearl is a hard object produced by mollusks(a type of sea-animal with shells).  They are used in jewelry along with other precious stones like diamond etc. They are majorly of two types: natural pearls and cultured pearls.

Natural Pearls:Screen Shot 2017-03-25 at 9.55.26 AM

Natural pearls form under a set of accidental conditions when a microscopic intruder or parasite enters a bivalve mollusk and settles inside the shell. After a couple of years, a pearl forms and the shell may be found by a lucky pearl fisher.

Cultured Pearls:

Culture pearlsCultured Pearls are produced artificially through various methods including using freshwater or seawater shells, transplanting the graft into the mantle or into the gonad, and adding a spherical bead as a nucleus. Most saltwater cultured pearls are grown with beads. The cultured pearls make up nearly 100% of the pearls sold today. Natural pearls now only account for less than 1/1000th of a percent of the pearls on the market today.

Cultured pearls can be distinguished from natural pearls by X-ray examination.

 

What is Pearl Farming ?

Pearl farming is the culture of producing  pearls under controlled conditions through farming of creatures called as Oyesters. Cultured pearls are grown on what are known as pearl farms. Several thousand oysters are nucleated and then cared for during the 2-5 years required for a pearl to grow and develop. Like any other form of farming, pearl farming can be as dependent on luck as it is on skill. An entire bed of oysters can be completely devastated by unpredictable and uncontrollable factors, such as water pollution, severe storms, excessive heat or cold, disease and many other natural and man-made phenomena.

 

How Do Oysters Make Pearls ?

A natural pearl begins its life inside an oyster’s shell when an intruder, such as a grain of sand or bit of floating food, slips in between one of the two shells of the oyster, a type of mollusk, and the protective layer that covers the mollusk’s organs, called the mantle.

In order to protect itself from irritation, the oyster will quickly begin covering the uninvited visitor with layers of nacre — the mineral substance that fashions the mollusk’s shells. Layer upon layer of nacre, also known as mother-of-pearl, coat the grain of sand until the iridescent gem is formed.

Cultured pearls are made in the same way. The only difference is that instead of accidental circumstances, a “pearl farmer” embeds a grain of sand into the mollusk.

 

Now, what is Rajasthan Government planning ?

Rajasthan Government is planning to start pearl farming in Rajasthan as it has potential to give good returns to our farmers. To start with, officials will receive training from a pearl culture institute in Bhubaneswar. From Odisha, we will also be bringing oysters and mussels to facilitate pearl cultivation. Additionally, a pond with brackish water has already been readied for the purpose while the construction of a state-of-the-art lab for grafting tissues from oyster shells is underway. The government is also in process of identifying a fresh water source near Kota region to launch similar project.

As per the plan, farmers from various parts of the state, who want to diversify into other areas of production, will be identified and exposed to this farming option and required technologies. Along with this, the government will also take up the task of marketing pearls.

Reference:

  • News Source – Times of India
  • Knowledge – Wikipedia & others.
  • Satyanarayan Yadav

    *मोती क्या है ?
    प्राचीन काल से ही मोती को इसके आकर्षण के कारण रत्नों की रानी का स्थान प्राप्त है, मोती या ‘मुक्ता’ एक कठोर पदार्थ है जो मुलायम ऊतकोंवाले जीवों द्वारा पैदा किया जाता है। रासायनिक रूप से मोती सूक्ष्म क्रिटलीय रूप में कैल्सियम कार्बोनेट है जो जीवों द्वारा केन्द्रक (न्युक्लिअस) के उपर परत दर परत चढ़ाकर बनाया जाता है। आदर्श मोती उसे मानते हैं जो पूर्णतः गोल और चिकना हो, किन्तु अन्य आकार के मोती भी पाये जाते हैं। अच्छी गुणवत्ता वाले प्राकृतिक मोती प्राचीन काल से ही बहुत मूल्यवान रहे हैं। इनका रत्न के रूप में या सौन्दर्य प्रसाधन के रूप में उपयोग होता रहा है।
    मोती की निर्माण प्रक्रिया सीप नाम का एक जन्तु, जिसे मॉलस्क कहते हैं, अपने शरीर से निकलने वाले एक चिकने तरल पदार्थ द्वारा अपने घर का निर्माण करता है। सीप एक प्रकार से घोंघे के प्रजाति है । इसके अन्दर वह अपने शत्रुओं से भी सुरक्षित रहता है। घोंघों की हजारों किस्में हैं और उनके शेल भी विभिन्न रंगों जैसे गुलाबी, लाल, पीले, नारंगी, भूरे तथा अन्य और भी रंगों के होते हैं तथा ये अति आकर्षक भी होते हैं। घोंघों की मोती बनाने वाली किस्म बाइवाल्वज कहलाती है इसमें से भी ओएस्टर सर्वाधिक मोती बनाता है। मोती बनाना भी एक मजेदार प्रक्रिया है। वायु, जल व भोजन की आवश्यकता पूर्ति के लिए कभी-कभी घोंघे जब अपने शेल के द्वार खोलते हैं तो कुछ विजातीय पदार्थ जैसे रेत कण कीड़े-मकोड़े आदि उस खुले मुंह में प्रवेश कर जाते हैं। घोंघा अपनी त्वचा से निकलने वाले चिकने तरल पदार्थ द्वारा उस विजातीय पदार्थ पर परतें चढ़ाने लगता है। भारत समेत अनेक देशों में मोतियों की माँग बढ़ती जा रही है, लेकिन दोहन और प्रदूषण से इनका उत्पादन घटता जा रहा है। अपनी घरेलू माँग को पूरा करने के लिए भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार से हर साल मोतियों का बड़ी मात्रा में आयात करता है।
    सीप, हमारे देश में नदियों, झरने और तालाब में मौजूद हैं। इनमें मछली पालन के अलावा हमारे बेरोजगार युवा एवं किसान अब मोती पालन कर अच्छा मुनाफा कमा सकते है।
    सीपों की सर्जरी पूरे साल की जा सकती है (अप्रैल जून माह को छोड़कर) । खेती शुरू करने के लिए किसान को पहले तालाब, नदी आदि से सीपों को इकट्ठा करना होता है। इसके बाद प्रत्येक सीप में छोटी-सी शल्य क्रिया के उपरान्त इसके भीतर गोल, आधा गोल या डिजायनदार बीड जैसे स्वास्तिक,श्री साईं बाबा ,प्लस ,786,गणेश, बुद्ध, पुष्प आकृति आदि डाले जाते है । फिर सीप को बंद किया जाता है। अन्दर से निकलने वाला पदार्थ नाभिक के चारों ओर जमने लगता है जो अन्त में मोती का रूप लेता है। लगभग 8-9 माह(केवल डीजायंदर अन्य 2 साल बाद ) बाद सीप से मोती निकाल लिया जाता है।
    लागत (एक हजार (1000) सीपों के पालन के लिए :-
    (क) एक बार निवेश : –
    1. तालाब (10 x 10 फीट) – 10000 रुपये, *
    2. जाल – 5000 रुपये,
    3. टैंक – 2 (सर्जरी के बाद का ट्रीटमेंट) – 4000 रुपये,
    4. लैब इक्यूपमेंट, टूल – 3000
    टोटल – 22000 रुपये
    * टैंक, एक्वेरियम, बाल्टी में भी फार्मिंग की जाती है
    (क) आवर्ती (क्रमशः) निवेश 🙁 आप इसको कम-ज्यादा बी कर सकते है)
    1. सीप – 10 रुपये,-10000
    2.न्युक्लिअस (इम्पोर्टेड)** – 5 रुपये(10000 रूपये)
    3. दवाइयां – 100 रुपये
    टोटल=22000+10000+10000+100 = 42100/-
    ** न्युक्लिअस 100% इल्शियम कार्बोनेट से तैयार, सीमेंट और araldite से नहीं
    (ग) मुनाफा :-
    1. सफलता की दर – 50 % (100 % भी हो सकती है देख-रेख पर निर्भर),
    2. तैयार मोती – 2000 (दो हजार) – 1 सीप से दो मोती
    3. प्रति मोती औसत दर – 100 – 300 रुपये
    4. 1000 (मोती) x 250 (रुपये) = 2,50,000 (दो लाख पचास हजार रुपये)
    सीप के अन्दर बनाने वाले मोती का रंग सीप की प्रजाति और वातावरण पर निर्भर करता है, काली मोती बनाने के सर्जरी के तरीके में कोई अंतर नहीं होता
    -मोती की खेती उसी प्रकार से की जाती है जैसे मोती प्राकृतिक रूप से तैयार होता है।
    -मोती की खेती करने के लिए इसे छोटे स्त र पर भी शुरू किया जा सकता है। इसके लिए आपको तालाब बनाना जरूरी नहीं है ।
    – छोटे – छोटे टैंक बनाकर, बाल्टी और एक्वेरियम बनाकर भी मोती की खेती शुरू की जा सकती है
    -8-9 महीने बाद एक सीप से 2 डिजायनर मोती तैयार होता है, जिसकी बाजार में कीमत 300 रुपए से 1500 रुपए तक मिल जाती है।
    – बेहतर क्वारलिटी और डिजाइनर मोती की कीमत इससे कहीं अधिक 10 हजार रुपए तक अंतर्राष्ट्रीरय बाजार में मिल जाती है।
    – 20 महीने बाद गोल मोती तैयार होती है, जिसकी कीमत 500 से 50000 या उससे ज्यादा भी हो सकती है
    – जयपुर,हैदराबाद,कोलकाता,DELHI, सूरत, अहमदाबाद, मुंबई आदि बड़े शहरों में मोती के हजारों व्या पारी मोतियों का कारोबार करते हैं, जिन्हें मोती बेचा जाता है
    – इनके अलावा आप अपने मोतियों को डायरेक्टज भी इंटरनेट व अन्य माध्यबम से बेच सकते हैं।
    – हमारी कंपनी के माध्योम से भी आप अपने मोती बेच सकते हैं।
    बेरोजगार,छात्र-छात्राएं, किसान और नौकरीपेशा लोग भी इस खेती को कर सकते हैं-
    – इस खेती को करने के लिए बहुत ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं होती
    – आप इसकी सर्जरी पार्ट टाइम में भी कर सकते है(प्रतिदिन दो घंटे)
    – हमारी नयी तकनीकी के द्वारा आप आटोमेटिक सिस्टम भी लगा सकते हैं, जिससे ज्यादा देखभाल की जरुरत भी नहीं पड़ती
    *VISION:-
    हमारा लक्ष्य यह है कि भारत को मोती निर्यात के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल किया जाय, जैसा की आप सभी को विदित है कि विश्व में चीन मोती निर्यात में सबसे ऊपर है, लेकिन आप सभी को यह भी मालूम है की इस देश के उत्पादों की गुणवत्ता का भरोसा नहीं कर सकते, यही बातें मोती पर भी लागू होती है.
    आज के समय में भारत का बाजार नकली और बनावटी मोतीयों से इस प्रकार दूषित हो चूका है की, प्राकृतिक मोती खरीद पाना हर किसी के लिए एक चुनौती बन गया है, लोग मोती खरीदते समय यह निश्चित नहीं कर पाते की वे जो मोती खरीद रहे हैं वो शत प्रतिशत असली और प्राकृतिक है.
    अपने इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमारी टीम इस विषय पर लगातार काम कर रही है, जिससे भारत को मोतीयों के निर्यात और उपभोग पर आत्म निर्भर बनाया जा सके, जिससे यहाँ के किसान और छात्र वित्तीय रूप से मजबूती हासिल कर सकें.
    TRAINING :-

    * शिक्षण में थ्योरी और प्रैक्टिकल का सम्पूर्ण अध्याय शामिल
    * प्रशिक्षण के बाद भी 24 x 7 सहायता
    प्रशिक्षण के लिए आवश्यक दस्तावेज:
    परिचय पत्र (आधार,ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर आईडी,पासपोर्ट या पैन कार्ड) की स्व प्रमाणित फोटो कापी – 01.
    पासपोर्ट फोटो – 01
    प्रशिक्षण का पाठ्यक्रम : – (समरी)
    1. मीठे पानी में पाए जाने वाले सीपों का विवरण.
    2. सीपों की आतंरिक संरचना.
    3. तालाब और टंकी का निर्माण.
    4. इस्तेमाल किये जाने वाले पानी का शोधन.
    5. केमीकल और डिजिटल उपकरणों द्वारा पानी की प्रयोगशाला विधि से जांच और गुणवत्ता में सुधार करना.
    6. सीपों के लिए चारे का निर्माण करना.
    7. सर्जरी से लिए सीपों को तैयार करना.
    8. सर्जरी के उपकरणों (imported व स्वदेशी) की पहचान.
    9. केन्द्रक (Nucleus- imported) की पहचान और इसका निर्माण करना.
    11. विन्भिन्न प्रकार के सर्जरी :-
    a. Mantle cavity (डिजायनर और आधे गोल मोती).
    b. Mantle tissue (छोटे, गोल और दवाइयों में इस्तेमाल होने वाले मोती).
    c. Gonadal (पूर्ण गोल मोती).
    12. सर्जरी के बाद की देखभाल.
    13. तालाब या टंकी में विस्थापित करना.
    14. तालाब और टंकी के पानी की गुणवत्ता को सुधार करना.
    15. पाले हुए सीपों से मोती प्राप्त करना.
    16. सीपों की हैचरी (प्रजनन).
    17. महत्वपूर्ण बिंदु.
    नोट : Black Pearl (काली मोती) बनाने की ट्रेनिंग देने वाली संस्थाओं के झांसे में न आयें, क्यूंकि सीप के अन्दर बनने वाले मोती का रंग, सीप की प्रजाति और वातावरण पर निर्भर करता है, सर्जरी के तरीके पर नहीं.

    मोती उत्पादन को बहुत ही फायदे का बड़ा सोदा माना जाता है | मोती को अंग्रजी में पर्ल कहते हैं। यह चंद्रमा का रत्न है इसलिए इसे चंद्रमा संबंधी दोषों के निवारण के लिए पहनते हैं। प्राचीनकाल से ही मोती का उपयोग विभिन्न प्रयोजनों में किया जाता होगा इसलिए इसका वर्णन ऋगवेद में भी मिलता है।मोती एक प्राकृतिक रत्न है जो की सीप से पैदा होता है | भारत सहित हर जगह मोतियों की मांग बढ़ती जा रही है अपनी घरेलु मांग को पूरा करने के लिए भारत अंतराष्ट्रीय बाजार से हर साल मोतियों का बड़ी मात्रा में आयत करता है |प्राकृतिक रूप से एक मोती का निर्माण तब होता है जब कोई बाहरी कण जैसे रेत , कीट ,.. आदि किसी सीप के अंदर /भीतर प्रवेश कर जाते है (अन्दर डाले जाते है ) और सीप उन्हें बहार नहीं निकाल पाता , जिसकी वजह से सीप को चुभन पैदा/ उत्पन होती है इस चुभन से बचने के लिए सीप अपने से रस(लार जैसा लिक्विड ) स्राव करती है जो की उस कीट या रेत , कण पर जमा हो जाती है जो की चमकदार होती है इस प्रक्रार उस कण / रेत पर कई परत जमा होती रहती है इसी आसान तरीके को नेचुरल मोती उत्पादन में इस्तेमाल किया जाता है और यह केल्सियम कार्बोनेट , जैविक पदार्थों व् पानी से बना होता है बाजार में मिलने वाला मोती नकली , प्राकृतिक या फिर उपजाए हुए हो सकते है नकली मोती प्लास्टिक या मोती से मिलते जुलते घटको को मिला कर मशीन के दवारा इच्छित आकार और रंग में डाले जाते है | प्राकर्तिक मोतियों का केंद्र बहुत ही सूक्षम होता है और बाहरी सतह मोटी , आकार में छोटा और इसकी आकृति बराबर नहीं होती है| पैदा किया हुआ मोती भी प्राकर्तिक मोती की तरह ही होता है जिसे मानव हस्तक्छेप द्वारा तैयार किया जाता है जिसमे आकार और आकृति इच्छित होती है |
    *सीपो के प्रकार/ जाती ( मीठा पानी में सीपो का परिचय ):-
    भारत में सीपो की कई प्रजातियां पाई जाती है भारत में मीठे पानी में पायी जाने वाली अधिकतम सीपो में मोती उत्पन्न करने की गुणवत्ता पायी जाती है जिनमे से कुछ प्रजातियां ही मोती बनाने में इस्तेमाल की जाती है जिसमे लेमिलिडेन्स मॉर्गिनेलिस , लेमिलेडेन्स कोरियानस और पेरेसिया कोरुगाटा और इनकी सभी उप – प्रजातियां है |
    * मोती की खेती केसे करे*
    मोती की खेती के लिए सबसे अनुकूल मौसम शरद ऋतु यानी अक्टूबर से दिसंबर तक का समय माना जाता है। कम से कम 10 गुणा 10 फीट(10 फीट लम्बा 10 फीट चोडा और लगभग 6 फीट गहरा ) या बड़े आकार के तालाब में मोतियों की खेती की जा सकती है। मोती संवर्धन के लिए 0.4 हेक्टेयर जैसे छोटे तालाब में अधिकतम 25000 सीप से मोती उत्पादन किया जा सकता है। खेती शुरू करने के लिए किसान को पहले तालाब, नदी आदि से सीपों को इकट्ठा करना होता है या इन्हे ख़रीदा भी जा सकता है। इसके बाद प्रत्येक सीप में छोटी-सी शल्य क्रिया के उपरान्त इसके भीतर 4 से 6 मिली मीटर व्यास वाले साधारण या डिजायनदार बीड जैसे गणेश, बुद्ध, ॐ ,स्वास्तिक वाली आकृतिया डाली जाती है। फिर सीप को बंद किया जाता है।लगभग 8-10 माह बाद सीप को चीर कर डिजाइनर मोती निकाल लिया जाता है। भारत में जेसे सूखा-अकाल की मार झेल रहे किसानों एवं बेरोजगारो को मीठे पानी में मोती संवर्धन के क्षेत्र में आगे आना चाहिए क्योंकि मोतीयों की मांग देश विदेश में बनी रहने के कारण इसमें खेती का भविष्य उज्जवल प्रतीत होता है। भारत के अनेक राज्यों के नवयुवकों ने मोती उत्पादन को एक पेशे के रूप में अपनाया है ओर वो इससे अच्छा मुनाफा कमा रहे C{ |

    हमारा पता :-
    राजस्थान पर्ल फार्मिंग एंड ट्रेनिंग सेन्टर VPO खडब (बमनाला की ढाणी) नारेहडा तहसील (तालुक)- कोटपुतली, जिला जयपुर राजस्थान पिन कोड 303105
    RAJASTHAN PEARL (MOTI)
    THE FRESH WATER PEARL
    AN ISO CERTIFIED FRESH WATER PEARL FARMING & TRAINING CENTER

    TRAINING & RESEARCH CENTER:-
    CALL :-(+91)-9928784765 , 8890700305 ,9414784765
    WHATSUP :- (+91) – 9928784765
    E-MAIL ID :-rajasthanpearlfarming.training@gmail.com